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Kachra prabandhan kise kahte hai रीट एग्जाम

कचरा प्रबंधन किसे कहते हैं - भारत में महानगरों से प्रतिदिन लगभग एक लाख टन अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं। छोटे नगरों से निकलने वाले कूड़ों की प्रति व्यक्ति औसत मात्रा 0.1 किग्रा. है जबकि बड़े नगरों में 0.4 से 0.6 किग्रा. औसत कूड़ा निकलता है। कचरे का व्यवस्थित रूप से निपटान करने की प्रक्रिया को कचरा प्रबन्धन कहते हैं।

किसी भी कचरे को सही तरह से निपटाने के लिए उसे संग्रह, परिवहन, निगरानी और उस पर कुछ खास प्रक्रिया करनी पड़ती है। उसे ही कचरा प्रबंधन या अपशिष्ट प्रबंधन कहते है।

Kachara prabandh
Kachara prabandh for reet

कचरा ( अपशिष्ट पदार्थ) : दैनिक कार्यों के फलस्वरूप जो पदार्थ अनावश्यक एवं अनुपयोगी होते हैं, उसे फेंक देते हैं। ये ही अनुपयोगी (अनावश्यक) पदार्थ कचरा कहलाता है।

अपशिष्ट के प्रकार - अपशिष्ट दो प्रकार का होता है ।

जैव निम्नीकरण अपशिष्ट और अजैव निम्नीकरण अपशिष्ट

(1) जैव निम्नीकरण अपशिष्ट - जीवाणुओं द्वारा अपघटित होने वाले अपशिष्ट उदाहरण- पेड़-पौधो की ' पत्तियां, फल सब्जी के छिलके, माँस, रद्दी कागज, कपड़ा, मल, गोबर आदि।

(2) अजैव निम्नीकरण अपशिष्ट -जीवाणुओं द्वारा अपघटित नहीं होने वाले अपशिष्ट । उदाहरण- पेन्ट, काँच, धातु के टुकड़े, प्लास्टिक की वस्तुऐं आदि।

अवस्थाओं के आधार पर विभिन्न अपशिष्ट सामग्री को निम्नानुसार ठोस, द्रव एवं गैस में भी विभाजित किया जा सकता है ।

अवस्थाओं के आधार पर अपशिष्ट - ठोस अपशिष्ट,  द्रव अपशिष्ट  व गैस अपशिष्ट ।

द्रव अपशिष्ट - गन्दा पानी, तेल, पेन्ट, वाहित मल

ठोस अपशिष्ट - प्लास्टिक, काँच के टुकड़े, फल सब्जी के छिलके

गैस अपशिष्ट - वाहनों, कल कारखानों से निकलने वाला धुआँ

कचरा (अपशिष्ट पदार्थों) निपटान की विधियाँ

1. कम्पोस्ट: जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट पदार्थ जैसे-फुल सब्जी के छिलकों, मल-गोबर, पेड़-पौधों की पत्तियाँ, घास फूस, सड़ी-गली वस्तुओं आदि से खाद बनाई जाती है। इस प्रकार की सामग्री को एक गड्ढे में डाल देते हैं। गड्ढा किसी छायादार कोने में बनाया जाता है। तत्पश्चात् इस गड्ढे को मिट्टी से इस प्रकार ढकते हैं कि उसमें नमी बनी रहे और हवा मिलती रहे। कुछ महीनों में यह सामग्री जीवाणु द्वारा अपघटित होकर खाद में बदल जाती है जिनका उपयोग खेतों में कर सकते हैं। इसे कम्पोस्ट कहते हैं। गोबर गैस प्लांट में प्रयुक्त गाय व भैंस का गोबर कुछ समय बाद खाद में बदल जाता है तथा इससे ईंधन गैसें प्राप्त होती है।

2. वर्मी कम्पोस्ट : अपशिष्ट में विशेष रूप से लाल केंचुएँ जिन्हें रेड अर्थवर्म (Red Earthworm) कहते हैं, उन्हें मिलाया जाता है। ये केंचुएँ कार्बनिक पदार्थ खाते हैं। केंचुओं से निकलने वाला अपशिष्ट पदार्थ उच्च गुणवत्तायुक्त खाद होता है जिसे वर्मी कम्पोस्ट खाद कहते हैं और यह प्रक्रिया वर्मी कम्पोस्टिंग कहलाती है।

3. ठोस अपशिष्ट पदार्थों का निस्तारण : ठोस अपशिष्ट पदार्थ को शहर या कस्बे के बाहर गड्ढे में एकत्रित करते हैं। फिर उसे मिट्टी की परत से ढ़क देते हैं। कुछ समय पश्चात ये अपघटित हो जाते हैं। इसे लेंडफिलिंग कहते हैं।

पुनर्चकरण तरीके (Recycling Methods) : अपशिष्ट से संसाधनो को या किसी भी मूल्यवान चीज को निकालना पुनर्चकरण के नाम से जाना जाता है।

1. उपयोग की मात्रा कम करना (Reduce) : अनुपयोगी पदार्थों की मात्रा कम करना जैसे- टूटा टिन का डिब्बा, प्लास्टिक की बोतल, डिब्बा, टूटी मटकी आदि अनुपयोगी सामग्री का उपयोग छोटे-छोटे फूल, सब्जी के पौधे लगाकर घरेलु उपयोग में ले सकते हैं। ऐसी अन्य सामग्री को कचरे से अलग करने से अनुपयोगी सामग्री की मात्रा कम हो जाएगी।

2. पुन: उपयोग में लेना (Reuse) : घरेलू अनुपयोगी सामग्री में से ऐसी सामग्री को पृथक करें जिनका पुन: उपयोग किया। 'जा सकता है। जैसे- बैटरी, धातु के बर्तन, लोहे का भंगार, टूट डिब्बे, काँच की बोतल, जूट की सामग्री आदि को दूसरे घरेलु कार्यों हेतु उपयोग में लिया जा सकता है।

3. पुनः चक्रण (Recycle) : प्लास्टिक एवं काँच की अपशिष्ट सामग्री को अनुपयोगी सामग्री से अलग कर इनको फैक्ट्रियों में पुनः चक्रण हेतु भेज दिया जाता है तथा इनसे उपयोगी वस्तुएँ बनायी जाती है। पुनः चक्रण के समय इनमें कुछ रंग प्रदान करने वाले अभिकर्मक मिला दिए जाते हैं। विशेष रूप से ऐसी सामग्री का उपयोग खाद्य सामग्री के संरक्षण करने हेतु बैग, पैकिंग बोरी, डिब्बा आदि बनाने में किया जाता है।

भस्मीकरण (Incineration) :

निष्पादन की इस विधि में अपशिष्ट पदार्थ का दहन किया जाता है। जिससे अपशिष्ट ताप, गैस, भाप और राख में परिवर्तित हो जाते हैं। चिकित्सकीय अपशिष्ट के निपटान की सर्वोत्तम विधि है

भस्मीकरण जापान जैसे देशों में ज्यादा प्रचलित है क्योंकि इसमें कम भूमि की जरुरत पड़ती है और इस हेतु भूमिभराव के जितने बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता नहीं होती है।

अपशिष्ट निस्तारण के अन्य उपाय इस प्रकार हैं

गहरे महासागरो में अपशिष्ट का निस्तारण किया जा सकता है। किन्तु इसमें यह ध्यान देना आवश्यक है कि सागरीय पर्यावरण प्रदूषित न हो

हड्डियों, वसा, पंख, रक्त आदि पशु अवशेषों को पका कर चर्बी प्राप्त की जा सकती है जिनका प्रयोग साबुन बनाने में किया जाता है तथा इसके प्रोटीन अंश वाला भाग पशु के चारे के रूप में उपयोगी होता है।

कूड़े-करकट को अत्यधिक दाब से ठोस ईंटों में बदला जा सकता है।

नगरीय जल-मल को नगर से दूर गढ़ों में डाला जाए तथा यहां से शुद्धिकरण के पश्चात ही इसका सिंचाई आदि में उपयोग किया जाना चाहिए।

अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Manegement) : भारत में महानगरों से प्रतिदिन लगभग एक लाख टन अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं। छोटे नगरों से निकलने वाले कूड़ों की प्रति व्यक्ति औसत मात्रा 0.1 किग्रा. है जबकि बड़े नगरों में 0.4 से 0.6 किग्रा. औसत कूड़ा निकलता है। कचरे का व्यवस्थित रूप से निपटान करने की प्रक्रिया को कचरा प्रबन्धन कहते हैं।

घरेलू कचरे का प्रबंधन : घरेलू कचरे का प्रबन्धन करने के लिए तीन डिब्बे रखे जाने चाहिए।

हरा (Green) डिब्बा - जिसमें पत्ते, फल एवं सब्जी के छिलके, खराब भोजन सामग्री आदि जैविक अपशिष्ट को एकत्रित करें।

नीला (blue) डिब्बा - जिसमें अजैविक अपशिष्ट सामग्री जैसे-प्लास्टिक की सामग्री, काँच के टुकड़े एवं चीनी के बर्तन आदि।

काला (black) डिब्बा- जिसमें विषैले पदार्थ, दवाइयों के अपशिष्ट, बैटरी, सेल, अनुपयोगी दवाई, पेन्ट, तेल-सिरिंज, सौन्दर्य प्रधान सामग्री को एकत्रित करें।

अपशिष्ट से होने वाले नुकसान

1. अपशिष्ट पदार्थ मानव के साथ-साथ पेड़-पौधे, जन्तुओं व पर्यावरण को भी हानि पहुँचाते हैं।

2. प्राकृतिक सौन्दर्य को प्रभावित करता है।

3. संक्रामक रोगों के फैलने की संभावना बढ़ जाती है

4. दुर्गन्ध उत्पन्न करते हैं 

5. हानिकारक ग्रीन हाऊस गैसें उत्सर्जित होती हैं जो वातावरण को प्रदूषित करती हैं।

6. अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट जैसे प्लास्टिक, हानिकारक विषैले पदार्थ उत्सर्जित करने लगते हैं। प्लास्टिक जो एक पेट्रोलियम आधारित उत्पाद है इससे हानिकारक विषैले पदार्थ घुलकर जल के स्त्रोतों तक पहुँच जाते हैं जिनसे कई प्रकार के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

7. जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है।

8. भूगर्भीय जल स्त्रोत दूषित हो रहे हैं।

9. खून में थेलेटस की मात्रा बढ़ जाती है।

10. गर्भवती महिलाओं के शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है।

11. पॉलिथीन की थैलियों को फेंकने पर जल का बहाव अवरूद्ध हो जाता है।

12. पॉलिथीन कचरा जलाने से कार्बनडाई आक्साइड, कार्बनमोनो ऑक्साइड, डाईऑक्सीस जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती है। इनसे श्वसन, त्वचा, आँखों आदि से संबंधित बीमारियाँ होने की आशंका बढ़ जाती है।

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